Monday, August 17, 2015

क्यों हैं

कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों हैं 
वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों हैं 
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों हैं
यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों हैं
एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ लें दामन 
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन 
इतनी क़ुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों हैं
दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई 
एक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई 
आस जो टूट गयी फिर से बंधाता क्यों हैं
तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता 
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता 
हैं जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों हैं

कैफ़ी आज़मी

Sunday, August 9, 2015

बहुत भीड़ है इस महुब्बत के शहर मैं.....

मैंने तुझे शब्दों में महसूस किया हैलोग तो तेरी तस्वीर पसंद करते हैं ..!!!


टकरा जाता हूँ अक्सरमैं तेरे साये सेतुम दिखते जब नही हो तोमहसूस क्यों होते हो मुझे..!!


बेवजह हो गयी तुमसे इतनी मुहब्बतचलो अब वजहभी बन जाओ जीने की...!!


उज़ड़ जाते है सर से पाव तक वो लोगजो किसी बेपरवाह से बे-पनाह मोहब्बत करते है..!!

Wednesday, August 5, 2015

तू चलता जा

लहरो से हताश है नौका फिर भी तू चलता जा,
बहुत रंग बदलती है दुनिया तू भी रंग बदलता जा।
पिघल रही है ये शमा-ए-जिन्दगी शाम-ओ-सहर,
बहता चल हवा के संग तू भी थोड़ा पिघलता जा।
बहलाती है दिल सबका दुनिया भर की चकाचौंध,
अपनी मस्ती मे नाच तू दिल बनकर बहलता जा।
बहुत रोड़े आएंगे तेरी कामयाबी की राहो में,
जीत कर हर बाधा को तू मुसीबतों को निगलता जा।
ख्वाहिश-ए-दुनिया है कि तु शमा बनकर बुझ जाए,
बना दे मशाल खुद को "अभि" पहरो-पहर जलता जा।

Tuesday, August 4, 2015

यादों की बारिश

शाम को जब ऑफिस से निकल रहा था तो एकाएक बादलो की तरफ नजर गयी तो ऐसा लगा की शायद जम के बारिश होने वाली है ऑफिस से बाहर आकर जब गाड़ी को हाई वे पर डाला तो बारिश की बूंदों ने तन को भिगोना चालू कर दिया इससे पहले की कुछ और सोच पाता बारिश एकदम से तेज हो गयी पानी की फुहारें मन को आराम दे रही थी....पानी की टप टप करती हुई बुँदे जब सड़क पर पड़ने लगी तो उस पर जमी हुई धूल भी बह कर साफ होने लगी और इसी के साथ जेहन में अचानक से तुम याद आ गए बारिश की बुँदे शायद मेरे एहसासों पर पड़ी वक्त की गर्द को धोने लग गयी थी भुला हुआ सा कोई शख्स फिर से याद आने लग गया था...भावनाये जब मन से उमड़ चली तो आँखों के रस्ते धीरे धीरे करके बहने लग गयी....बारिश ने भी तेजी पकड़ ली थी और अंतर मन में छिपे यादों के सेलाब ने भी उसका साथ देते हुए जोर से बरसना चालू कर दिया...

गाड़ी को रोड के साइड में उतार कर स्टैंड पर लगा दिया और बैठ गया सीट पर ये सोच कर कि बारिश के साथ साथ अब कुछ पुराने सी यादों के खूबसूरत से एहसास में भी भीग लेता हूँ क्या पता फिर फुर्सत मिले न मिले..बाहर की बारिश तन को भिगो रही थी और अंदर कही तुमसे जुडी यादों की बारिश मन को बड़े गहरे से भिगोने लग गयी अचानक से याद आ गया वो लम्हा जब पहली बार तुम मेरे साथ लांग ड्राइव पर गयी हुई थी और यूँ ही अचानक से बारिश आने लग गयी मै गाड़ी को कही शेड में खड़ी करने के लिए सोच ही रहा था पर तुमने कहा कि रहने दो बस यु ही ड्राइव करते रहो मुझे बारिश में भीगना बहुत पसन्द है..अच्छा इतना फ़िल्मी होने की क्या जरूरत है?जब मेरा हीरो मेरे साथ हो तो जाहिर सी बात है कि मेरा फ़िल्मी होना लाजमी हो जाता है न।हमेशा की तरह तुमने अपने उत्तर से मुझे लाजबाब कर दिया था...बारिश जोरो से हो रही थी और मैने गाड़ी रोड के साइड में लगा दी गाड़ी से उतर कर तुम अपनी बाहों को फैला कर बारिश की बूंदों को अपने आगोश में समेटने की कोशिश करने लग गयी थीअरे सुनो तुम्हे ऐसा करते देख कर कुछ लाइन तुम पर बना कर सुनाना चाहता हूँ....शायर महोदय अभी बारिश के मजे लो जब देखो तब तुमको शायरी ही सूझती रहती है....देख लेना एक दिन यही शायरी मेरी पहचान बनेगी।हाँ ठीक है न मै भी आ जाउंगी ऑटोग्राफ लेने ठीक है अब तो खुश हो न...??हाँ खुश बहुत खुश....सुनो वो चाय की दुकान पर चलते है न चाय पियेंगे तो कुछ राहत मिल जायेगी।चाय पीते पीते मैं तुम्हे देख रहा था बारिश में भीग कर तुम्हारे बाल उलझ से गए थे और तुम उनको सुलझाने की कोशिश में लगी हुई थी...रहने दो न बारिश की बुँदे तुम्हारे बालो में उलझी हुई अच्छी दिख रही है...हाँ हाँ तुम्हे तो हर चीज अच्छी लगती है।मेरी एक बात का जबाब दोगी??हाँ बोलो न!!राह चलते चलते अगर हम तुम बिछड़ गए तो क्या तुम मुझे इसी तरह याद रखोगी??इससे पहले मै कुछ और बोल पाता तुम्हारी उंगलिया मेरे होंठो पर लग कर मेरी जुबान को खामोश कर चुकी थी।क्या हो गया है तुमको ये कैसी बहकी बहकी सी बात करने लगे हो?नही बस यूँ ही पूछ रहा था?अरे बाबा मै तुमको छोड़कर कही नही जाने वाली हूँ!! समझे तुम?अगर चली गयी तो?चली भी गयी तो हरदम तुम्हारी यादों में एक खूबसूरत सा एहसास बन कर रहूंगी तुम्हे जब भी अकेला देखूँगी तन्हा देखूँगी झट से भाग कर तुम्हारे जेहन में आ जाऊँगी...तुम्हे कभी भी अकेला नही छोडूंगी...देख लेना एक दिन कभी यूँ ही बादल बरसेगा और मै फिर से बूंदों में बदल कर तुमसे लिपट जाउंगी.और तुम फिर से एक बार मेरे एहसासों से अंदर तक भीग जाओगेँ...सच कहा था तुमने आज फिर से बादल बरस रहे है और मै भी जम के उन यादों में भीग रहा हूँ कतरा कतरा उन एहसासो को महसूस कर रहा हूँ जो अब बस मेरे प्यार की आखिरी अमानत बन के रह गयी है,भीगी पलकों के साथ जी रहा हूँ तन्हा सा उन खूबसूरत से पलों को जिनमे कभी तुम रहा करती थी और वो पल जो शायद तुम मेरे पास भूल कर चली गयी हो..मुझे मालूम है कि मेरी आवाज तुम तक अब नही पहुँच पाती है लेकिन फिर भी अभी एक लाइन जो जेहन में बन पड़ी है तुमको सुना देता हूँ।"मेरे दिल की सूखी पड़ी इस जमीन को सोचकर दूर कही तुमने अपनी जुल्फों में उलझे हुए पानी को निचोड़ा होगा....ये बादल जो इतनी शिद्दत से मेरे ऊपर बरस रहा है जरूर इसमें कही तेरे प्यार का ही बोसा होगा...."यकीं मानों तुम्हारी यादों में भीग जाने के ही डर से मै बारिशो में बाहर नही निकलता हूँ कही फिर से तुम न बरसने लगो मेरे जेहन में आकर इसलिए बारिश आने पर शेड के अंदर ही रहता हूँ....तुम्हारे बिना ये बुँदे जहर सी लगती है...बारिश थम चुकी है पर तुम्हारी यादों के छीटे मन को अभी भी भिगों रहे है।आँखों से हो रही बरसात भी अब रुक सी चुकी है... बारिश क्या आई आज फिर से तुम याद आ गए पलकें जरूर भीग गयी पर अच्छा लगा कुछ पल तुम्हारी यादों के साथ गुजार कर और फिर से ये विस्वास भी पुख्ता हो गया कि अब भी तुम मेरे दिल धड़कन और मन मन्दिर में पहले की तरह रची बसी हुई हो उसी कवि की सुंदर कल्पना के रूप जो गाहे बेगाहे उसकी रचना के रूप में बाहर आ ही जाती है।बहुत कुछ छुट गया है पीछे यूँ सफर में भागते भागते पर अब भी तुम दिल के किसी कोने में बाकि हो और इसी तरह मौका मिलने पे मुलाकात करने आ जाती हो...

आज फिर से भीग गया उन यादों की बारिश में जो कभी कभी आती है पर मन को बेहद सुकुन और आराम देकर चली जाती है। कभी कभी यूँ ही फुर्सत निकाल कर बारिश बन के आ जाया करो तपते हुए इस मन को बड़ा आराम मिल जाता है।

अंत में बस इतना ही कहूँगा..."तेरी यादों की बारिश ने यूँ भिगोया हैमेरा मन भी आज जी भर के रोया हैतूने जाकर फिर एक बार भी ना सोचा 

क्या तूने पाया और क्या मैंने खोया है."

Monday, August 3, 2015

मीना कुमारी

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली
रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी
आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली
जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज़ सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली
मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली
होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आँखों में, सादा-सी जो बात मिली

मीना कुमारी